आखिर इतने वर्षों तक अमेरिकी सैनिक की मौजूदगी के बावजूद तालिबान कमजोर क्यों नहीं हुआ

By नौशीन खान

2001 , 11 सितम्बर , दिन मंगलवार अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी और न्यूयॉर्क शहर में बड़ा धमाका हुआ । दुनियां के सबसे बड़े बिजनेस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के जुड़वा टावर और डिफेंस विभाग के मुख्यालय पेंटागन को विमानों ने घेर लिया था । यह हमला 9/11 हमले के नाम से मशहूर है। इस दिन वाशिंगटन डीसी और न्यूयॉर्क शहर के लोगों को नहीं मालूम था कि यह काला दिन उनके लिए तबाही का दिन होगा । इस हमले ने अमेरिका के सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए थे । अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश हर हाल में इसका बदला लेना चाहते थे।

वहीं दूसरी ओर ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व वाले अलकायदा ने इस हमले की जिम्मेदारी ले ली थी और बाद में यह खुलासा हुआ कि इस हमले को अफगानिस्तान की जमीन से अंजाम दिया जा रहा था। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय तालिबान को हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को सौंपने के लिए कहता रहा और तालिबान अमेरिका समेत इंटरनेशनल नेताओं को आंख दिखाता रहा। किसी भी मुद्दे पर ना पहुंचने के बाद अमेरीका ने अफगानिस्तान में अपनी फौज भेजकर तालिबानियों के खिलाफ जंग छेड़ दी। अफगानिस्तान में तालिबान विरोधी गुट अमेरिकी और ब्रिटिश सेनाओं की मदद से राजधानी काबुल की ओर बडे़ और तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी तालिबान को सत्ता से बेदखल कर दिया गया।

2020 के दोहा समझौते में तालिबान को भागीदार बना कर अमेरिका ने जाने- अनजाने तालिबान को मजबूत ही बना दिया। इसे ट्रम्प प्रशासन की सबसे बड़ी भूल के रूप में देखा जाना चाहिए। दरअसल, अमेरिका अफगानिस्तानी आतंक से लड़ने के बजाय उसके एक हिस्से के उपयोग की कोशिश करने लगा। यही कारण है कि वर्षो से अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद तालिबानी आतंकवाद जड़ से समाप्त नहीं हुआ।


 ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम ( OEF )

4 सितम्बर , 2001 को जॉर्ज डब्लयू बुश ने इस दिन को शोक और स्मरण राष्ट्रीय दिवस घोषित किया । “और मलबे की ढेर के ऊपर खड़े होकर अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि 11 सितंबर के हमलों के लिए जिम्मेदार आतंकवादी जल्द ही अमेरिका से सुनेंगे।“( बदला लेंगें )  उन्होंने यह तय किया कि वह अपनी सेना को अफगानिस्तान में युद्ध के लिए भेजेंगे ।7 अक्टूबर 2001 को 11 सितंबर के हमलों के जवाब में राष्ट्रपति ने घोषणा कि अलकायदा और तालिबान को लक्षित करने वाले हवाई हमले की शुरुआत हो चुकी है और इस हमले को ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम ( OEF )  नाम दिया गया ।

अब तक युद्ध मे कितने लोगों की जानें गई

2001 में तालिबान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू होने के बाद से 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में जान गंवा चुके हैं जबकि 20660 सैनिक लड़ाई के दौरान घायल भी हुए हैं। लेकिन अमेरिका के ये आंकड़े अफ़गानिस्तान के आंकड़ों के सामने कुछ भी नही है। अमेरिका मे स्थित ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोध की मुताबिक 2019 तक 45000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं और माना जाता है कि इससे दोगुनी तादात में अफ़गानी नागरिकों को अपनी जान गवानी पड़ी है।2009 मे ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद वह  अफगानिस्तान में सैन्य गतिविधियों को बढ़ाते हैं।

2 मई , 2011 अमेरिका और पूरी दुनिया के लिए एक एतिहासिक दिन बन गया। बराक ओबामा के शासन काल मे अमेरिकी नौसेना के सील कमांडो ने पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घुसकर अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया । इस दिन आतंक का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया था । अमेरिकी सेना ने सिर्फ करीब 40 मिनट में ऑपरेशन नेपच्यून स्पीयर को खत्म कर दिया था । लेकिन इस ऑपरेशन की तैयारी 2007 से चल रही थी । इस घटना क्रम के बाद ओबामा को लगा कि अमेरिकी सेना को अब वापस देश में बुला लेना चाहिए लेकिन यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती।

दोहा समझौता 2020

एक समय ऐसा आया जब यह संघर्ष अमेरिका का सबसे लंबा युद्ध बन गया । इसमें अमेरिका के क़रीब 978 अरब डॉलर और 2,300 से अधिक लोगों की जान बेकार चली गई । इससे यह युद्ध अमेरिकी नागरिकों के बीच तेज़ी से अलोकप्रिय होने लगा अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी अभियान ख़त्म करने की मांग तेज़ी से बढ़ने लगी । वर्ष 2014 से अमेरिका ने अपने आप को अफ़ग़ान बलों के प्रशिक्षण और सामान मुहैया कराने की भूमिका तक सीमित कर लिया। 

डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद उन्होंने इस स्थिति को देखा और फ़रवरी 2020 में एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए तालिबान के साथ गहन बातचीत शुरू की। इनको यह लग रहा था कि जब तक तालिबान को इस बातचीत का हिस्सा नहीं बनाया जायेगा तब तक कुछ हल नहीं निकल सकता है । इसलिए साल 2020 में कतर के दोहा शहर में एक मीटिंग रखी गई ,जिसमे अमेरिका तालिबान और अफ़गानिस्तान के बीच कुछ समझौते हुए । इसमें यह कहा गया कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से अपने बचे हुए सैनिकों को वापस लेने को सहमत हो गया । वहीं तालिबान ने वादा किया कि वह अल-क़ायदा या किसी अन्य चरमपंथी समूह को अपने नियंत्रण वाले इलाकों में काम करने की अनुमति नहीं देगा। यह भी कहा गया कि 1,000 अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के बदले 5,000 तालिबान क़ैदियों की जेल से रिहाई की जाएगी । साथ ही तालिबान के ख़िलाफ़ लगे प्रतिबंधों को हटा दिया जाएगा । इस समझौते में अमेरिका , अफ़गानिस्तान और तालिबान को शामिल किया गया । इस बातचीत के बीच में अफ़गानिस्तान एक तरह से कठपुतली की तरह लग रहा था जिसका अब कुछ रोल नहीं रहा। लेकिन जब अफ़गानिस्तान के साथ तालिबान की बातचीत हुई तब कोई हल नहीं निकल पा रहा था । उस वक़्त केवल सप्ताह भर के भीतर तालिबान ने 10 प्रांतीय राजधानियों पर क़ब्ज़ा कर लिया था ।

अमेरिका और तालिबान के प्रतिनिधि दोहा समझौते के तहत हस्‍ताक्षर करते हुए

अमेरिकी सैनिकों को अफ़गानिस्तान से वापस बुलाने का ऐलान  

जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद जब धीरे – धीरे तालिबान ने कई इलाकों पर कब्ज़ा जमाने लगा। तब उन्होंने 15 अप्रैल 2021 में ऐलान किया कि अमेरिकी बलों को 20 साल बाद भी अफगानिस्तान में क्यों रहना चाहिए और वक्त आ गया है कि अमेरिकी सैनिक देश की सबसे लंबी जंग से वापस आएं “, “यह कभी भी कई पीढ़ियों तक चलने वाला मिशन नहीं था । हम पर हमला किया गया था । हम स्पष्ट लक्ष्यों के साथ युद्ध में गए । हमने उन उद्देश्यों को प्राप्त किया। इस बात का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अल कायदा नेता ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी बलों ने 2011 में मार दिया और संगठन को अफगानिस्तान में ‘डिसग्रेड’ कर दिया गया। इन सब बातों से यह समझ आता है कि : —

अमेरिका को अपनी सेना पर बहुत गर्व था जो कि यह उसका एक भ्रम था । अमेरिका को लगता था कि तालिबान के पास उतने अच्छे हथियार नहीं है जितने हमारे पास है , ना ही उनके पास तकनीकि सुविधाएं है । इतना गर्व महसूस करते हुए भी अमेरिका तालिबान को नही हरा पाया ।

• 2020 दोहा में हुआ समझौता और तालिबान को उस मीटिंग में बुलाना , उनसे बातचीत करना ट्रंप प्रशासन कि यह सबसे बड़ी भूल थी । और इसका नतीजा यह हुआ कि तालिबान ने हफ्ते भर में 10 प्रांतों पर कब्ज़ा कर लिया था ।

• अमेरिका की राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिकी  सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला तब लिया जब तालिबान का ज़ुल्म अफ़गानिस्तान के ऊपर बढ़ता जा रहा था । बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक 6 जुलाई को करीब आधी अमेरिकी सेना अफ़गानिस्तान को बिना बताए आधी रात मे बगराम से रवाना हो गए थी ।अमेरिका ने बाद में घोषणा की कि उसने बगराम को खाली कर दिया है । बाइडेन के इस फैसले को कई लोगों ने इसकी आलोचना भी की थी । 


• अमेरिका की इन सभी गलतियों को देखते हुए अफगानिस्तान के हालात बद से बत्तर हो गए । जिसमे महिलाएं और बच्चों को बुरे हालातों से गुजरना पड़ रहा है । 19 अगस्त को अफगानिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर अफगान लोगों ने सड़कों पर रैली निकाली और अपने राष्ट्रीय झंडे को फहराया । जिसमें केवल 7 महिलाएं थी उनमें से एक महिला “क्रिस्टल बयात ने एक इंटरव्यू में बताया कि मैने पहली बार तालिबानियों को देखा , उन्होंने आगे कहा कि उस प्रोटेस्ट में हर तालिबानी कह रहे थे कि तुम लोग केवल 20 दिनों के लिए स्वतंत्र हो ।“ इन 20 दिनों के अंदर तालिबानी क्या नया रूख अख़्तियार करेंगे ये अभी तक किसी को नही पता है।

• अफगानिस्तान के हालात अब यह हो चुके हैं की वहां के लोगों ने अपने हाथों में हथियार उठाना शुरू कर दिया है क्योंकि उन्हें लगता है की हमारी मदद के लिए कोई मुल्क खड़ा नहीं होगा हमें अपनी जान खुद बचानी होगी।

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