अफगानिस्तान के हालिया हालातों ने विश्व को झकझोर कर रख दिया है

अफगानिस्तान के हालिया हालातों ने विश्व को झकझोर कर रख दिया

By सरिता

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में किसी देश का यह हाल होगा, विश्वास नहीं होता है। यह निश्चित हो गया कि अफ़ग़ान सरकार पूरे अफगानिस्तान में फैले अमेरिकी फौजों के सुरक्षा आवरण के कारण ही किसी तरीके से देश चला पा रही थी। वे सिर्फ अमेरिका के बलबूते ही देश चला पा रहे थे। ना ही उनके खुद के नेताओं और ना ही सेना में  देश चलाने की प्रतिबद्धता थी और ना ही तालिबान जैसे पाषाणयुगीन आतंकवादी संगठन से लड़ने का माद्दा था।

सब लोग अमेरिकी फौजों की मौजूदगी में महफूज रहकर बस सत्ता सुख और विलासिता का आनंद ले रहे थे।सरकार और सेना के बड़े अफसर सब सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार में लगे हुए थे और आतंकवाद से लडने के नाम पर उन्हें जो भी भारी मात्रा में विदेशी आर्थिक  मदद मिलती थी। वो सारे पैसे उनकी ही जेबों में जाते थे।

आज जो अफरातफरी और देश छोड़ने के हालात अफगानिस्तान के हैं , बंटवारे के समय इंडिया के भी थे। हालांकि विभाजन के समय भारत के हालात इससे कई गुना ज्यादा भीषण थे।  तथाकथित रूढ़िवादी लोगों को अफगानिस्तान की ये हालत देखकर तकलीफ हो रही है वो कुछ दशक पहले जाकर देखें तो हमारा देश भी कुछ इन्हीं परिस्थितियों में था और दक्षिण पंथी लोग बदलाव नहीं चाहते थे।  

वे लोग नहीं चाहते थे  कि दबे कुचले लोगों और दलितों को अधिकार मिले। वे नहीं चाहते थे कि स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार मिले। और पिछले 50 सालों से महिलाओं के जो हालात अफगानिस्तान में है वे ही हालात भारतीय महिलाओं के 2500 साल पहले तक थे।सती प्रथा जैसी क्रूर सामाजिक बुराइयां थी। छुआ छूत जैसी सामाजिक बुराइयां थी। पर्दा प्रथा थी। बाल विवाह प्रथा थी। विधवा महिलाओं को समाज से दूर कर दिया जाता था। पति कि मृत्यु का दोषी भी उन्हें ही ठहराया जाता था। बच्चियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। एक पुत्र की कामना में ना जाने कितनी ही स्त्रियों से शादी कर ली जाती थी।

राज महलों में स्त्रियों को बांदियों के तौर पर रखा जाता था। नगर वधू और देवदासी जैसी घटिया और अमानवीय  प्रथा प्रचलित थी। ना जाने स्त्रियों और निम्न वर्गों के लोगों के शोषण के  और क्या क्या उपाय और नियम कायदे थे। संपन्न और ऊंची जाति के लोग  शूद्रों और निम्न जाति के लोगों का शोषण और अत्याचार  करते थे।

कुछ महान और जुझारू लोगों की प्रगतिशील और मानवीय सोच और सतत संघर्ष के कारण ही आज हम सब थोड़ी स्वतंत्रता और सामाजिक समानता वाला समाज देख पा रहे है। फिर भी भारत के सुदूर ग्रामीण इलाकों में आज भी जाति पाति जैसी कु प्रथाएं प्रचलित है और आज भी हमें कई सामाजिक कु प्रथाओं के खिलाफ मीलों तक चलना है।

अपने देश का निर्माण करना और न्याय और स्वतंत्रता आधारित समाज का निर्माण करना उस देश के ही नागरिकों की जिम्मेदारी है। और इसके लिए वहां के लोगों को एक लंबे और भीषण संघर्ष के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। आज ग्लोबलाइजेशन  के इस दौर में अफगानिस्तान का वापस बीस साल पुरानी स्थिति में चले जाना बहुत ही अचंभित और निराश करता है।

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