अपना जीवन अपना अधिकार

जो हमसे दुर्बल है उसका अपने उपयोग के लिए शोषण करना अमानवीय हरकत है। जब पुरुष औरतों को दुर्बल मानते हैं तो उसका शोषण करते हैं, जब जानवरों को दुर्बल मानते हैं तो अपने स्वाद के लिए उसे नोच-नोच कर खा जाते हैं। दूसरों का शोषण ही पुरुषार्थ बन जाता है।

औरतों के साथ अजीब विडंबना है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उनको उनके ही जीवन के अधिकार से बेदखल कर दिया जाता है। एक औरत को उनके जीवन पर उनका अधिकार नहीं होता, सामाजिक ताने-बाने से बनी सामाजिक औपचारिकताऐं महिलाओं को कठपुतली की तरह नचाती हैं। जो महिलाएं स्वतंत्र जीवन जीना चाहती हैं समाज उनके चरित्र पर सवाल पैदा कर उन्हें अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश करता है।

जमशेदपुर की अंजना मिश्रा की पढ़ाई पुणे और हैदराबाद में हुई। अच्छी शिक्षा लड़कियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन उनका आत्मनिर्भर होना तथा अपने निजी जीवन के सभी फैसले खुद लेना इतना भी आसान नहीं रहा। इसके लिए उन्हें लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी तथा समस्त पारिवारिक-सामाजिक ताने-बाने की बलि देनी पड़ी। सबसे बड़ा सामाजिक झूठ यह है कि  पढ़े-लिखे परिवारों में महिलाओं के अधिकारों को नहीं दबाया जाता है।

अंजना मिश्रा का जन्म आर्थिक रूप से उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ है, एक ऐसे परिवार में जहां औरतें भी पढ़ी-लिखी और नौकरी करने वाली होती है। इनकी मां शिक्षिका थी। घर का माहौल शैक्षणिक रहा जहां लड़कियों को पढ़ने की पूरी आजादी थी।  पढ़ाई पूरी होने के बाद इन्होंने अपने करियर पर ध्यान देना शुरू किया, इसके साथ ही परिवार वालों ने शादी की तैयारी भी शुरू कर दी। ज्यादातर शादी की लड़कियों के अधिकारों, उनकी स्वतंत्रता को खत्म करने का संस्थागत पहल बन जाती है।

परम्परागत शादी में प्रायः सभी रस्में लड़की की सामाजिक प्रस्तिथि को लड़के की तुलना में कम कर के आंका जाता है। रस्मे लड़के-लड़की में असमानता को कायम रखने के लिए ही बनाई जाती है। लड़की चाहे लड़के की तुलना में ज्यादा पढ़ी लिखी हो, योग्य हो लेकिन उसको भी देना ही पड़ता है। इसके ठीक विपरीत लड़कों को सिर्फ लेना ही होता है।  इन्ही रस्मों रिवाजों से पुरुषों को शोषण करने का सामाजिक अधिकार मिल जाता है। जैसे शादी में कन्या दान का रस्म ही क्यों न हो, कन्यादान का रस्म एक लड़की को व्यक्ति से वस्तु में बदल देता है जो दान में किसी को दी जाए। अंजना मिश्रा को पुरुष प्रधान हर रस्म खलने लगी,  उनके द्वारा रस्मों का विरोध शुरू हुआ जो आगे चल कर रिश्तों के विरोध में बदल गया। हर रस्म ही महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले दूसरे पायदान पर खड़े करने की पहल दिखने लगी। भारतीय लड़कियां अभिमन्यु बन जाती हैं जो रिश्तों और रस्मों के चक्रव्यूह में फंसी रहती हैं। स्वाभिमान पूर्वक जीवन जीने की राह ने अंजना मिश्रा के घरेलू जीवन को अशांत कर दिया। एक औरत के पारिवारिक अस्तित्व के लिए इनकी लड़ाई ने इन्हें एक अजीब मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, वो था पारिवारिक अलगाव! लिहाजा इन्होंने अपने पति का घर छोड़ दिया। आगे चल कर तलाक की सभी कागजी औपचारिकताऐं भी पूरी कर ली गई। जिस वक्त इनका तलाक हुआ उस समय इनकी गोद में इनकी ढाई साल की बेटी थी और इनके पर्स में मात्र ढाई हजार रुपये।

करीब 20 साल बीत चुका है। आज अंजना मिश्रा अपनी बेटी के साथ अपने दम पर आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं जहां अपने जीवन के हर फैसले खुद लेती हैं। इनके संघर्ष में इनकी बेटी भी इनके साथ है। अंजना मिश्रा पर्यावरण संरक्षण, वीगेन फूड को प्रमोट करने, स्ट्रीट एनिमल के अधिकारों के लिए काम करती हैं। ये वीगेन कीचेन भी चलती हैं। वीगेन डाइट को प्रमोट करने के लिए इवेंट भी आयोजित करती हैं। 

अंजना मिश्रा वीगेन लाइफ स्टाइल को प्रमोट करती हैं

अंजना मिश्रा बताती है कि जो हमसे दुर्बल प्राणी हैं, कमजोर हैं उनके अधिकारों का संरक्षण करना ही इंसानियत है। अपने स्वाद के लिए जानवरों का मांस खाना, अपनी सुविधा के लिए उसके चमड़े का उपयोग करना मानवता नहीं है। जबकि प्रकृति ने हमें आहार तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए कई विकल्प उपलब्ध करवाया है। जो हमसे दुर्बल है उसका अपने उपयोग के लिए शोषण करना अमानवीय हरकत है। जब पुरुष औरतों को दुर्बल मानते हैं तो उसका शोषण करते हैं, जब जानवरों को दुर्बल मानते हैं तो अपने स्वाद के लिए उसे नोच-नोच कर खा जाते हैं। दूसरों का शोषण ही पुरुषार्थ बन जाता है।

अंजना मिश्रा बताती है कि जब तक औरत नतमस्तक होकर अपने पुरुष प्रधान परिवार में रहने लगती है तब तक उसका कोई विरोध नहीं होता लेकिन जैसे ही वो अपने फैसले खुद लेने की कोशिश करती है उसका विरोध शुरू हो जाता है। साथ ही साथ वो यह महसूस भी करती है कि कभी कभी महिलाएं अबला होने की अपनी परम्परागत छवि का दुरुपयोग भी करती हैं जिससे महिलाओं के स्वावलंबी जीवन की छवि को ठेस पहुंचती है।

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