अग्नि कोण (दक्षिण और पूर्व) का दरवाजा बन सकता है अशांति और असफलता का कारण

दक्षिण और पूर्व दिशा को अग्नि कोण कहते है। वास्तुशास्त्र के अनुसार यह स्थान रसोईघर का है। इस जगह सूर्य और उसके ताप का प्रभाव अधिक होता है। अगर इस दिशा में घर का दरवाजा स्थित है तो वह कलह, तनाव तथा असफलता का कारण हो सकता है।

लौकिक दुनिया की गुत्थियों को वास्तुशास्त्र के जरिये भी सुलझाया जा सकता है। हमारे भारतीय सनातन संस्कृति में वास्तुशास्त्र का बड़ा महत्व है। घर के सभी दिशाओं में कोई न कोई देवता का वास होता है। उस दिशा में उनके सम्मान के विपरीत काम करने से घर कलह, अशांति का अखाड़ा बन सकता है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने वास्तुशास्त्र की परिकल्पना की है।


दक्षिण और पूर्व दिशा को अग्नि कोण कहते है। वास्तुशास्त्र के अनुसार यह स्थान रसोईघर का है। इस जगह सूर्य और उसके ताप का प्रभाव अधिक होता है। अगर इस दिशा में घर का दरवाजा स्थित है तो वह कलह, तनाव तथा असफलता का कारण हो सकता है। 


जिस घर के दक्षिण और पूर्व दिशा यानि ‘अग्नि कोण’ में दरवाजा है वहां रहने वाले लोग तथा वहां नियमित आने वाले लोगों में अक्सर तनाव की स्थिति रह सकती है।  वास्तुशास्त्र के अनुसार वहां पारिवारिक कलह का माहौल कायम रहा सकता है। ऐसे घर में चोरी का भी खतरा रह सकता है। घर के बेटे की तबियत खराब रह सकती है। 

अगर आपके ऑफिस, दुकान या अन्य बिजनेस सेंटर में भी दरवाजा इस दिशा में है तो वहाँ भी तनाव की स्थिति रह सकती है। वहां काम करनेवाले स्टॉफ में आपसी मतभेद बना रहा सकता है। साथ ही साथ ग्राहकों के साथ भी तनाव रह सकता है।पूर्व तथा उत्तर दिशा में स्थित दरवाजा की शुभ फल दायक होता है। इसके अतिरिक्त किसी भी दिशा का दरवाजा परेशानी का सबब बन सकता है।

ध्यान दें :—


◆ घर में दो से अधिक दरवाजे नहीं होने चाहिए । एक बड़ा दूसरा छोटा। 
◆ याद रहे, दरवाजा किसी भी हालत में  मकान के एकदम कोने में न बनाएं।
◆ घर मे मुख्य दरवाजे के ठीक सामने किसी भी तरह का कोई खम्भा, कुआं न हो।
◆ दरवाजे के पास कचरे न रखे।
◆ दरवाजे के सामने  सीढ़ियां न हो।
◆ एक पल्ले वाला दरवाजा शुभकारी नहीं माना जाता है। दो पल्ले वाला हो।
◆ मुख्यद्वार खोलते ही सामने सीढ़ी नहीं बनवाना चाहिए।   

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